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​नोटबंदी के अलावा देश में चल रहे है कई और मुद्दे

Aajtak 22 Nov. 2016 17:25
देश में इस वक्त हर तरफ नोटबंदी का शोर है, हर कोई नोटबंदी की बात कर रहा है और हर बहस के केंद्र में भी नोटबंदी ही है, लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं है कि देश में दूसरे मुद्दे और समस्याएं खत्म हो गई हों. जंतर मंतर पर जाएंगे, तो आपको पता चल जाएगा कि टीवी चैनलों और अखबारों में बहस और समस्या भले ही नोटबंदी पर शुरु होकर नोटबंदी पर खत्म हो रही हो, संसद में भले ही नोटबंदी का ही हंगामा चल रहा हो, लेकिन लोग अपनी मांगों और मुद्दों को लेकर जंतर मंतर पर डटे हुए हैं. नोटबंदी पर उनकी अपनी राय है, लेकिन उनका अपना मुद्दा ही फिलहाल उनकी प्राथमिकता है, जिसे वो देश के हुक्मरानों तक पहुंचाना चाहते हैं.
मंगलवार को आम आदमी पार्टी ने संसद मार्ग पर मार्च निकाला और नोटबंदी का विरोध किया, लेकिन जितने नारे और भाषण आम आदमी पार्टी के मंच से हुए, जंतर मंतर पर उससे कहीं ज्यादा भाषण अलग-अलग संस्थाओं के मंच पर हुए और नारों का जोश इन मंचों पर भी कम नहीं था.

उत्तर प्रदेश की आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का धरना नोटबंदी के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शन के ठीक पास में ही चल रहा था. लेकिन जितनी शिद्दत से नोटबंदी के खिलाफ बात हो रही थी, उतने ही जोश से आंगनवाड़ी की महिलाएं अपने हक की आवाज उठा रही थीं. ये कार्यकर्ता यूपी में अपने वेतन में बढ़ोतरी चाहती हैं और इसी मांग को लेकर बड़ी संख्या में जुटी हैं. एक कार्यकर्ता सुमन ने बताया कि सरकार उनकी सुनती नहीं है, इसलिए दिल्ली में डेरा डालना पड़ा है. सालों से तनख्वाह नहीं बढ़ी है, ऐसे में उनके पास जंतर मंतर पर धरना देने के अलावा कोई चारा भी न था.
निखिल भारत बंगाली उत्सव समन्वय समिति मंच भी यहीं से थोड़ी ही दूरी पर निखिल भारत बंगाली उत्सव समन्वय समिति का मंच सजा था, धरना स्थल पर संख्या भी अच्छी खासी थी और भाषण देने वालों और उनके जोश दोनों में ही कोई कमी नहीं थी. धरने में शामिल होने आए जयदेव भक्ता बताते हैं कि उनकी संस्था बंगाल से विस्थापित हिंदुओं के लिए काम करती है, लेकिन सरकार का नया कानून उनके अधिकारों में कटौती करने वाला है, इसी का विरोध करने और संसद तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए वो जंतर मंतर के धरने में शामिल हुए हैं, नोटबंदी से रुबरु हैं, लेकिन उनके लिए फिलहाल उनका मुद्दा अहम है क्योंकि ये उनके अस्तित्व की लड़ाई है.

इसी मंच के पीछे बुंदेलखंड किसान यूनियन के बैनर तले किसान धरने पर बैठे थे, बैनर पोस्टरों पर नारे लिखे थे कि किसानों की कर्ज माफी क्यों नहीं हो रही. यूनियन के प्रधान विमल कुमार शर्मा ने कहा कि मोदी जी ने चुनाव के पहले बुंदेलखंड के किसानों से कर्जा माफी का वादा किया था, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ. यूनियन के ही उमाकांत कहते हैं कि नोटबंदी से उन्हें भी फर्क पड़ा है, लेकिन कर्ज माफी का मुद्दा उनके लिए सबसे बड़ा है क्योंकि चार साल से बुंदेलखंड में सूखा है, वहां का किसान मरणासन्न है, कर्ज में डूबा हुआ है, उसके पास कर्ज चुकाने का कोई तरीका नहीं है, इसलिए संसद को अपनी आपबीती सुनाने के लिए यहां पहुंचे थे.
नोटबंदी के शोर के बीच भले ही धरना दे रहे लोगों के नारे दब रहे है, लेकिन इन्हें भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. हर बार संसद सत्र के दौरान लोग जंतर मंतर पर अपनी समस्याएं लेकर आते हैं और इस बार भी आए हैं, भले ही अब संसद से सड़क तक नोटबंदी का मुद्दा छाया हो, लेकिन उनके मुद्दों की अहमियत भी इससे कम नहीं हैं.

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